कब किस मोड पर आकर रुक जाती है
बगैर कोइ रुकावट की आगाह किये
लडखडाते...…सम्भल्ते
अपने आप को समझाते
कि यह अनुभव भी हमे
कुछ न कुछ तो निशचिन्त रुप से
सिखायेगाही
ह्रिदय को निचोडती है कुछ पल
जब खालिपन डट कर बैठ जाति है
शून्य को केन्द्र बनाये
मन हताश …कौन सम्झाये?
घडि के कांटो को जैसे किसि बलवान ने
दबोच लिया है अपने पूरी शक्ति से
ना छ्ठ रहे हैं उदासीनता के बादल
ना ठंडक मिल रही है ह्रिदय को
सुबह कि ओस की ताज़गी से
ना उम्मीद झांक रहि है
खिलते पंखडीयों की तरह
ना बसन्त आस पास फटक रहि है
जैसे की कोइ शिकवा हो
बस यही आसरा है कि
ऐसे दिनो की भी अन्त होती है
समय मरहम लगाती है
और एक दिन गेहेरी घाव भी
एक दाग बन कर रह जाती है ।

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