Saturday, December 6, 2008

Jindagi

बहुत अजीब है यह ज़िन्दगी
कब किस मोड पर आकर रुक जाती है
बगैर कोइ रुकावट की आगाह किये

लडखडाते...…सम्भल्ते 
अपने आप को समझाते
कि यह अनुभव भी हमे 
कुछ न कुछ तो निशचिन्त रुप से
सिखायेगाही

ह्रिदय को निचोडती है कुछ पल
जब खालिपन डट कर बैठ जाति है
शून्य को केन्द्र बनाये
मन हताश …कौन सम्झाये?

घडि के कांटो को जैसे किसि बलवान ने
दबोच लिया है अपने पूरी शक्ति से
ना छ्ठ रहे हैं उदासीनता के बादल
ना ठंडक मिल रही है ह्रिदय को 
सुबह कि ओस की ताज़गी से

ना उम्मीद झांक रहि है
खिलते पंखडीयों की तरह
ना बसन्त आस पास फटक रहि है
जैसे की कोइ शिकवा हो

बस यही आसरा है कि
ऐसे दिनो की भी अन्त होती है
समय मरहम लगाती है
और एक दिन गेहेरी घाव भी
एक दाग बन कर रह जाती है ।

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